हे मन! भर उड़ान क्षितिज तक - अमित शर्मा
हे मन ! भर उड़ान क्षितिज तक ,
तेरी मंजिल है आसमा,
करना है तारों से बात ,
एक रात चांद के साथ,
अब तक तू भटका कहां तक,
हे मन ! भर उड़ान क्षितिज तक ।
पंखों की जरूरत नहीं मुझे,
हौसलों से उड़ना है,
चाहिए मुझे सफल,
सरस मधुर जीवन,
पल भर में जीना है सदियों तक,
हे मन ! भर उड़ान क्षितिज तक ।
त्याग संयम और तपस्या,
उसमें अटल प्रयास,
हो जागरूक मैं एक दिन ,
श्रम बिंदु का फल पाऊंगा ,
खुशियों के गीत गुनगुनाऊंगा,
सुनाऊंगा फिर सफर जमी से क्षितिज तक,
हे मन ! भर उड़ान क्षितिज तक ।
-अमित शर्मा (राधेय)